Monday, 11 September 2017

प्रद्युम्न पर शोज.. पत्रकारिता का घटिया स्तर

अपने देश में पत्रकारिता का स्तर इतना गिर गया कि अब लोगो को किसी की संवेदनाओ से भी खेलने में कोई गुरेज़ नहीं है. आँखों में कोई शर्म नहीं है कि किसी से सवाल-जवाब करने से पहले उसकी हालत पर भी थोड़ा सा ध्यान दिया जाए. पिछले शुक्रवार से प्रद्युम्न की हत्या को हमारे न्यूज़ चैनल्स अपनी लोकप्रियता बढ़ाने के लिए इस्तेमाल कर रहे है. एक माँ होने के नाते मैं इस घटना को ज्यादा सोचने से भी कतराती हूँ. सोच कर ही डर लगता है कि क्या बीती होगी उस सात साल के मासूम पर और उसके परिवार के लोग कैसे इस असीम दुःख की घड़ी को जी रहे होंगे. पर क्या मीडिया और टीवी चैनल्स के लोग प्रद्युम्न के परिवार को शोक मनाने का समय दे रहे है? लगातार होती LIVE कवरेज से तो ऐसा नहीं लगता. दिन से मैं बस यही देख और सुन रही हूँ. प्रद्युम्न की माँ को कैसा लग रहा है.. वो कैसे बिलख बिलख कर रो रही है.. कैसे उसके पापा से होती पूछ-ताछ उन्हें चैन से अपने बेटे को याद भी नहीं करने दे रही.. कैसे प्रद्युम्न की बहन को भी हमारे आधुनिक संवाददाता बक्श नहीं रहे.. उससे भी सवाल पर सवाल किये जा रहे है.. सवाल भी ऐसे जिन्हे सुन कर कलेजा मुँह को जाए..लगातार आती प्रद्युम्न की तस्वीरें मुझे और दर्द देती है..पर और भी बड़ा दुःख हुआ जब देखा कि आधुनिक मीडिया के पढ़े लिखे लोग किसी की मृत्यु को भी TRP बढ़ाने का जरिया बना सकते है..
खबर जो है वो हम सब पिछले शुक्रवार से देख रहे है. हम ये भी समझ रहे है कि कैसे स्कूल की लापरवाही से एक बच्चा किसी और दुनिआ में चला गया. जांच से ये भी पता चल गया कि कैसे स्कूल में जरूरी नियमो की अनदेखी की गई. हम सभी ये सोच कर स्तब्ध है कि क्या किसी की मानसिक स्तिथि इतनी गिर सकती है कि यौन शोषण की कोशिश नाकाम होने पर वो बच्चे का गाला रेत दे. घटना गुरुग्राम की है पर देश के हर कोने में माता-पिता परेशान है. वो ये समझ नहीं पा रहे है कि अगर बच्चे स्कूल में भी महफूज़ नहीं है तो क्या किआ जाए..? पर हम बस सोच कर परेशान हो रहे है, प्रद्युम्न के परिवार पर क्या गुज़र रही होगी वो हम सोच भी नहीं सकते. हम ये ख्याल भी मन में नहीं लाना चाहते कि अगर उनकी जगह हम होते तो क्या करते..?
मुझसे देखा नहीं जा रहा प्रद्युम्न की माँ का हाल. पर कोई भी न्यूज़ चैनल हो सबने प्रद्युम्न की मृत्यु को एक फिल्म की तरह बना दिया है. जिसके प्रमोशन के लिए वो किसी भी हद तक जा रहे है.. प्रद्युमन पर बने शोज की लोकप्रियता को बढ़ाने के लिए नई नई पञ्च लाइन्स बनाई गई है.. "प्रद्युमन के घर से लाइव..." ,"सीधे खूनी बाथरूम से.." , "एक तड़पती माँ.." , "मासूम प्रद्युम्न की आत्मा चीख-चीख कर पुकार रही है, मुझे क्यों मार डाला अंकल?.." या फिर "प्रद्युम्न नहीं रहा, अब रुला रही हैं उसकी यादें. सुनिए इस मासूम के क़त्ल की कहानी लाइव".. सब में घटिया मानसिक साफ साफ दिख रही है. किसी को अवार्ड नहीं मिला कि उसका आगा पीछा सब छान डालो, एक ऐसी संजीदा घटना हुई है कि प्रद्युम्न के माता पिता को और सांत्वना और सहयोग की जरूरत है, LIVE कवरेज की नहीं..
देश के जाने माने लोग मीडिया और प्रेस की आज़ादी के कसीदे पढ़ते है. पत्रकार जगत के लोग खुद को जनता की आवाज बताते है और समय समय पर सरकार पर उनको दबाने का आरोप भी लगते रहे है. पर क्या यही पत्रकारिता है कि प्रद्युम्न के माता पिता के ज़ख्मो पर सवालों का नमक छिड़कते जाओ..? क्या यही मीडिया की आजादी है कि प्रद्युम्न के घर में घुस कर उसका कोना कोना टीवी पर दिखा डालो. "प्रद्युमन यहाँ खेलता था.. इसी पलंग पर सोता था.. यही पर उसका बस्ता टंगा होता था.." प्रद्युम्न को खुद की आवाज दे कर कई चैनल्स कहानियाँ भी सुना रहे है. कहानियाँ ऐसी है कि मेरे जैसी माँ बिना रोये नहीं रह सकती.. " मुझे घूमना बड़ा अच्छा लगता था.. पापा मुझे घुमाने ले जाते थे.. मैं अपनी बहन के साथ खूब मज़े करता था.. पापा मुझे कभी कभी अपने कंधे पर बिठा लेते थे.. आज फिर से एक बार उन्होंने मुझे अपने कंधे पर ले रखा है..आज मैं कंधे पर नहीं, उनकी गोद में आना चाहता हूँ.. पर अब मैं ऐसे नहीं कर सकता.. पापा भी जानते है ऐसा नहीं हो पाएगा अब कभी.."
हद हो गई हद, एक ही बात मन से निकल रही है " शर्म करो लोगो, कुछ देर छोड़ दो प्रद्युम्न की माँ को अपने बच्चे की यादो के साथ.. बक्श दो उसके परिवार को.. वो वैसे ही परेशान है उन्हें और मत परेशान करो..अगर कुछ करना चाहते हो तो कोशिश करो कि ऐसा किसी और बच्चे के साथ ना हो फिर कभी..और अगर शर्म रह ही नहीं गई है आँखों में तो अगली घटना का इंतज़ार करो.. वहाँ भी मसाला मिलेगा..तुम तो व्यापार कर रहे हो.. किसी के जीने-मरने के तुम्हे क्या.."


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