Monday, 14 August 2017

क्या हम सच में आजाद है..?


आजादी ऐसा शब्द है जो हमे एक अजीब सी ख़ुशी देता है, है ना? आजाद, मुक्त और स्वच्छंद..जो मन करे वो करना, जैसे मन करें रहना.. खुली हवा में सांस लेने का अपना मज़ा है..आजादी के साथ हमे आने वाला समय भी बेहतर नज़र आता है, अपना परिवार और खुशहाल दिखता है और जिंदगी आसान जान पड़ती है. 


जब १५ अगस्त १९४७ के देश आजाद हुआ था तो हर तरफ ख़ुशियाँ ही ख़ुशियाँ थी. लोग नाचे-गाए, दिए जलाए गए, मिठाईया बाटी गई और आजादी का जश्न मनाया गया. मैंने खुद तो नहीं देखा है वो जश्न, पर जब भी किताबो में इस बारे में पढ़ा और खुद को उनके बीच महसूस किआ तो लगा कि इतनी लम्बी दासता के बाद जब आजादी मिली होगी तो सच में दुनिया की सबसे बड़ी ख़ुशी मिली होगी लोगो को. उन्हें लग रहा होगा कि अब हम गुलामी की बेड़ियों से आजाद हो गये. वे समझ रहेे होंगे कि अब शोषक सरकार (विदेशी सरकार) चली गयी तो चारों ओर शांति ही शांति होगी,अब लोग सुखी होंगे. धनधान्य से सम्पन्न होंगे. बेकारी मिटेगी. गरीबी हटेगी एवं विषमता दूर होगी. भेदभाव की खाईं पटेगी, समानता आयेगी और इसी परिकल्पना से देश का आम आदमी खुशी से झूम उठा था. 

पर कागजो पर मिली आजादी के ७० साल बाद भी हम पूरी तरह से आजाद नहीं है.सियासत, भ्रष्टाचार, गरीबी, बेरोजगारी, आतंकवाद, उग्रवाद और अपराध के जाल में हमारा देश गुलाम का गुलाम रहा. जैसे जैसे आजाद भारत की परिपक्वता बढ़ रही है, हम तमाम तरह की विकृतियों की गुलामी की जकड़न में फंसते ही जा रहे हैं. स्वतंत्रता प्राप्ति के 70 सालो में देश की जो प्रगति होनी चाहिए थी, नहीं हो पायी. कहते हैं कि इसके पीछे भ्रष्टाचार की गुलामी सबसे बड़ी वजह है. आजादी के एक दशक बाद से ही भारत भ्रष्टाचार के दलदल में धंसता नजर आने लगा था. और अपना भारत समय के साथ इतना भ्रस्ट और दूषित हो गया कि आज हर आदमी किसी ना किसी चीज का गुलाम बन कर रह रहा है. 

आम जनता नौकरशाहो और नेताओ की मनमानियों की गुलाम है. कही लोग पानी की कमी के गुलाम है तो कही घरो में आज तक बिजली ना पहुंचने से अँधेरे के गुलाम. कुछ लोग दिन ब दिन बढ़ते प्रदुषण की वजह से बीमारियों के गुलाम है तो कही भगवान से माने जाने वाले डॉक्टरों के बढ़ते लालच के गुलाम. कुछ लोग सालो से इंसाफ की उम्मीद में अदालतों के गुलाम बन कर रह गए है तो वही कुछ लोग, जिनके बच्चे सरहद पर जान गवां चुके है, कभी ना मिट पाने वाली कड़वी यादो के गुलाम. बात देश में उग्रवाद के बढ़ने की करें, बात गरीबी के मकड़जाल की करें, बात बेतहाशा बढ़ती महंगाई डायन की करें, बात अपराध की करें, बात महिला सशक्तिकरण की करें या बात बेरोजगारी की करें, हम आम लोग बस गुलाम है जिनके हाथ बंधे है और कुछ खास कर नहीं सकते सिवाय आजादी की उम्मीद रखने के. 

वही कुछ ऐसे लोग ऐसे भी तो बुरी आदतों के गुलाम है. ये बढ़ते अपराधों और अशांति का मूल यही तो है. ज्यादा पैसो की चाहत, ज्यादा रुतबे की अकड़, दूसरे को नीचे दिखाने की ललक और जरुरत से ज्यादा कुंठा, आज ऐसे लोगो ना जाने कैसे-कैसे अपराध करवा रही है. देश के लगभग हर हिस्से में अलोकतांत्रिक व्यवहार, धरना, प्रदर्शन और हिंसा के चलते लोकतंत्र का ताना-बाना छिन्न-भिन्न हो रहा है और कितना दुखद है कि आजाद भारत में आजादी से घूमना अब मुश्किल होता जा रहा है.

अब गुलामी की तो हद है हमारे आस पास. बताती हूँ कैसे.. हम में से कई लोग अपने स्मार्ट फ़ोन के गुलाम है. सोते जागते बस फ़ोन चाहिए उन्हें. और उनमे से ही कुछ इंटरनेट और सोशल मीडिया के पूरे गुलाम है, कुछ गेम्स के तो बाकी के सेल्फी की आदत गुलाम. कितनी ही खबरे सुनाई देती कि लोग खतरनाक से खतरनाक जगहों पर भी सेल्फी लेने से बाज़ नहीं आते और कई बार अनहोनियों के शिकार बन जाते है. हम से ही कई ऐसे भी है जो खाने के गुलाम है, मीठा मना है पर खाए बिना रहा नहीं जाता. इसी तरह कुछ फ़िज़ूलख़र्ची की आदत के गुलाम, कुछ आलस तो गुलाम, कई सारे बेवजह इधर की उधर लगाने की चुहल के गुलाम, तो काफी लोग ऐसे भी है तो न्यूज़ चैनल्स के गुलाम है. सारा दिन बस रिमोट पकड़े न्यूज़ चैनल्स पर वही न्यूज़ अलग अलग अंदाज़ में सुनते रहते है.

तो आपको भी लग रहा है कि हम आजाद हुए ही नहीं कभी? क्या हम असली आजादी के मायने और महत्व जानते भी हैं या नहीं? और अगर जानते हैं तो उसे महसूस क्यों नहीं कर पाते हैं हम? सोचिये और हो सके तो जिन पर आपका बस है उस गुलामी को खतम कीजिये. पूरे समाज का नहीं तो खुद के भले के लिए कुछ चीजों की आदत बदलिए. देश हित में बड़े नहीं तो छोटे छोटे ही काम कीजिये. थोड़ी आजादी महसूस होगी यकीन मानिये.. 

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