Saturday, 28 January 2017

#MagicOfWarmth Kabhi-Kabhi pas aane ke liye..door jana hota hai!

“I’m blogging about my #MagicOfWarmth moment at BlogAdda in association with Parachute Advansed Hot Oil

I once read that the best way to spell love is “T.I.M.E”. Unfortunately, time is something that many of us hard to find. Whether it's the time to spend with family or with kids, or with friends. Because of today’s fast lives, we live in a stressful and busy world where many of us are juggling full-time careers with looking after a family and home. However, we are informed people and many of us now recognize the importance of taking care of our mental and physical health. So we are also trying to squeeze in time for work-out routine and relaxation into our overstretched lives. But what about our relationship health? It doesn’t need any supporting fact to recognize that vacations improves family bonding and hence relationships. But there is certainly something to the mention that spending time together as a family, away from the stresses of the daily routine of work, office and domestic life, can make us all happier. At least for a while!

In mid of last year, I (with my family ) got a chance to refresh my family and personal lives with enjoying a full week's vacation in Monsoon capital of India “Pune”. We went to a family friend's place there and the first time I realized that a bit of TLC is needed in every relationship to keep it harmonious. Scientist says humans are pre-programmed to love green spaces of nature. There is something really special about being in nature; something magical that calms the depths of our souls like nothing else. Really, with so much greenery and good weather, our Pune visit was awesomely wonderful. I even regretted that we live in Delhi. Seeing those greenery coated mountains and waterfalls, I am in love with Pune. Roaming around in drizzling rain and enjoying the best of nature’s presence along with good friends, what can be better than that? Our visit included many place around Pune including beautiful Lavasa and Khandala.

While going with the usual flow of life, we often neglect the importance of relationships. And time is essential for every relationship to both survive and shine. When we spend time with family and friends, it demonstrates our priorities in life. It shows our loved ones that they really matter and that being with them is meaningful to us. But unfortunately, we all only have 24 hours a day and 7 days a week so the only way to make more time for our relationships is to have a complete breakaway.

Thanks to my husband who realized that we, husband-wife, badly needed that 'us' time and he planned this wonderful break for me. We both are working and after having a naughty baby at home, we needed this magic of warmth to find our love back. Life had become usual and boring. And this vacation brought a huge change in our lives. “It’s quality, not quantity that counts”. And this is never truer than when we talk about time with our partner. Spending a week’s time, when we, husband-wife, had more reasons to laugh, enjoy and memorize, has made us recall our best of qualities which we normally ignore while balancing our routine office and family lives. True is that "Kabhi-Kabhi pas aane ke liye..door jana hota hai! " (Sometimes going far, gets people closer) With this almost 1200 km long journey, I have come close to both the friends' families who were with us in Pune. And worth mentioning, I have come closer to my husband! This was #MagicOfWarmth moment of us.

Have a look at this video. This will really prove that relationships can get it's charm back with just a little warmth :

Wednesday, 25 January 2017

कब होगा गणतंत्र हमारा ?

गणतंत्र बने ६७ साल हो गए है पर एक आज भी इस देख की स्त्री अपनी रचनात्मकता और बुद्धिमत्ता को दुनिया को दिखाने के बजाय खुद को बचाने में लगी है. वो रचनात्मकता जिसने इतिहास में भी कुछ पन्ने सिर्फ स्त्रियों के नाम किए है. वही रचनात्मकता आज स्त्रियों अपने आप को सड़को पर फिरने वाले मनचलो और घरो में रहने वाले रिश्तेदारो से बचाने में काम आ रही है. ६७ साल बहुत होते है किसी देश में बदलाव के लिए फिर भी स्त्रियों की दशा क्यों नही बदल पाई है जैसा हमारे संविधान में लिखा है? हर साल हम गणतंत्र-दिवस मनाने में लाखो रूपए खर्च कर रहे है पर वो पैसे स्त्रियों के लिए एक सुरखित देश बनाने में क्यों नही लगाए जा रहे है? पर सबसे बड़ा सवाल ये है की आज भी हम संविधान के पूरी तरह से लागू होने का इंतज़ार कर रहे है ऐसा क्यों है?

हमारे देख में आज भी कुछ लोगो के संविधान जैसी कोई चीज नही है. गरीबो, बाल मजदूरो और आदिवासियों का कोई पक्का संविधान नही है. स्त्रियों के लिए है तो भी वो मानने वाले कम ही है. इस विशाल गणतंत्र की चमक में हम स्त्रियों की आभा को किसने और कितना स्वीकारा है ये दिन रात हो रही घटनाओ से पता ही चल जाता है. आज भी जिन परिवारों में स्त्रियां सिर्फ घर का काम संभालती हैं उनको कोई खास सम्मान नही मिलता. उनके बच्चे अच्छी पढाई करके बड़े बड़े पदों पर है पर उनके सफल होने का श्रेय वो नही ले पाती. ऐसे घरो में पति बिना किसी बाधा के अपने काम पर जाते है क्योंकि बाकी कामो के लिए पत्निया घर पर है. पर वो उनको अपनी सफलता का कारन क्यों नही मानते? जो स्त्रियां काम कर रही है उनको छमता से ज्यादा अपना शरीर गलाना पड़ रहा है. वो खुल कर मदद भी नही मांग पाती. स्त्रियां न घर में सुरक्षित है और न बाहर. न बाहर उन्हें कोई ज्यादा गंभीरता से लेता है और न घर में. हाँ संविधान में जरूर है कुछ न कुछ है हर स्तिथि के लिए. पर ये जवानी से बुढ़ापे की ओर जाता गणतंत्र उन असंख्य महिलाओं को यह भरोसा क्यों नहीं दिला पाया कि इस सबसे बड़े लोकतंत्र के स्थायित्व की नींव में उनकी ही सहनशक्ति है? इस विशाल गणतंत्र घरेलू स्त्रियां कब तक आभा हीन रहेगी? कब तक दुनिया की सबसे तेज़ी से आगे बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था में कामकाजी स्त्रियां का श्रम बाकी पुरुषो के पीछे छुपता रहेगा?

निःसंदेह बहुत सी वजहें हैं जिनके लिए स्त्रियों की इस गणतंत्र का धन्यवाद देना चाहिए. अब उन्हें बेहतर पढ़ने के मौके मिल रहे है. वो जिस व्यक्तिगत आजादी को जी रही है वो इतिहास में बस एक सपना थी. हर तरह के शोषण से निपटने के लिए तमाम तरह के सख्त कानून हमारे लिए बने हैं. लेकिन इतने सारे सोने के सिक्के जैसे कानून हाथ में होने के बावजूद भी हम जीवन के बहुत से क्षेत्रों में अभी भी बहुत कंगाल हैं. स्त्रियां सिर्फ चमक दमक वाले शहरो में नही रहती. वो गांव और कस्बो में भी है जहा अभी भी जमाना बहुत पीछे है. हमें लिखित अधिकार तो दे दिए गए है पर उन अधिकारों पर अंकुश लगाने वाले और पचासों काम होने लगे है. भ्रूण हत्या, दहेज हत्या, बलात्कार, जबरन वैश्यावृत्ति, छेड़खानी, यौन शोषण का तेजी से बढ़ता ग्राफ हमारा जीना नरक बना रहा है. हम सहम कर जी रहे है कि कब कौन कहा हमें अपने शिकार बना लेगा. हमारी दिमागी ताकत का बड़ा हिस्सा इस ‘बचने‘ की जुगत सोचते जाने में ही खर्च हो जाता है. यह इस देश और गणतंत्र की बहुत बड़ी ‘क्षति‘ है जिसकी पूर्ति तब तक संभव नहीं जब तक ये संविधान लिखी बातें सच में लागू नही होगी. पर ये इंतज़ार तब तक ?

ठिठुरता हुआ गणतंत्र : हरिशंकर परसाई

एक बार फिर हम गणतंत्र-दिवस मनाने जा रहे है है. हमारे गणतंत्र का उत्सव ठण्ड में आता है तो कई बार इसे ठिठुरते हुए देखना और मनना पड़ता है. पर असल में हमारे साथ हमारा गणतंत्र भी ठिठुर रहा है सदियो से. कारन जानने के लिए हरिशंकर परसाई का व्यंग्य पढ़िए ‘ठिठुरता हुआ गणतंत्र’ :

चार बार मैं गणतंत्र-दिवस का जलसा दिल्ली में देख चुका हूँ। पाँचवीं बार देखने का साहस नहीं। आखिर यह क्या बात है कि हर बार जब मैं गणतंत्र-समारोह देखता, तब मौसम बड़ा क्रूर रहता। छब्बीस जनवरी के पहले ऊपर बर्फ पड़ जाती है। शीत-लहर आती है, बादल छा जाते हैं, बूँदाबाँदी होती है और सूर्य छिप जाता है। जैसे दिल्ली की अपनी कोई अर्थनीति नहीं है, वैसे ही अपना मौसम भी नहीं है। अर्थनीति जैसे डॉलर, पौंड, रुपया, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा-कोष या भारत सहायता क्लब से तय होती है, वैसे ही दिल्ली का मौसम कश्मीर, सिक्किम, राजस्थान आदि तय करते हैं। इतना बेवकूफ भी नहीं कि मान लूँ, जिस साल मैं समारोह देखता हूँ, उसी साल ऐसा मौसम रहता है। हर साल देखने वाले बताते हैं कि हर गणतंत्र-दिवस पर मौसम ऐसा ही धूपहीन ठिठुरनवाला होता है। आखिर बात क्या है? रहस्य क्या है? जब कांग्रेस टूटी नहीं थी, तब मैंने एक कांग्रेस मंत्री से पूछा था कि यह क्या बात है कि हर गणतंत्र-दिवस को सूर्य छिपा रहता है? सूर्य की किरणों के तले हम उत्सव क्यों नहीं मना सकते? उन्होंने कहा - जरा धीरज रखिए। हम कोशिश में हैं कि सूर्य बाहर आ जाए। पर इतने बड़े सूर्य को बाहर निकालना आसान नहीं हैं। वक्त लगेगा। हमें सत्ता के कम से कम सौ वर्ष तो दीजिए। दिए। सूर्य को बाहर निकालने के लिए सौ वर्ष दिए, मगर हर साल उसका छोटा-मोटा कोना तो निकलता दिखना चाहिए। सूर्य कोई बच्चा तो है नहीं जो अंतरिक्ष की कोख में अटका है, जिसे आप आपरेशन करके एक दिन में निकाल देंगे। इधर जब कांग्रेस के दो हिस्से हो गए तब मैंने एक इंडिकेटी कांग्रेस से पूछा। उसने कहा - ‘हम हर बार सूर्य को बादलों से बाहर निकालने की कोशिश करते थे, पर हर बार सिंडीकेट वाले अड़ंगा डाल देते थे। अब हम वादा करते हैं कि अगले गणतंत्र दिवस पर सूर्य को निकालकर बताएँगे। एक सिंडीकेटी पास खड़ा सुन रहा था। वह बोल पड़ा - ‘यह लेडी (प्रधानमंत्री) कम्युनिस्टों के चक्कर में आ गई है। वही उसे उकसा रहे हैं कि सूर्य को निकालो। उन्हें उम्मीद है कि बादलों के पीछे से उनका प्यारा ‘लाल सूरज’ निकलेगा। हम कहते हैं कि सूर्य को निकालने की क्या जरूरत है? क्या बादलों को हटाने से काम नहीं चल सकता? मैं संसोपाई भाई से पूछ्ता हूँ। वह कहता है - ‘सूर्य गैर-कांग्रेसवाद पर अमल कर रहा है। उसने डाक्टर लोहिया के कहने पर हमारा पार्टी-फार्म दिया था। कांग्रेसी प्रधानमंत्री को सलामी लेते वह कैसे देख सकता है? किसी गैर-काँग्रेसी को प्रधानमंत्री बना दो, तो सूर्य क्या, उसके अच्छे भी निकल पड़ेंगे। जनसंघी भाई से भी पूछा। उसने कहा - ‘सूर्य सेक्युलर होता तो इस सरकार की परेड में निकल आता। इस सरकार से आशा मत करो कि भगवान अंशुमाली को निकाल सकेगी। हमारे राज्य में ही सूर्य निकलेगा। साम्यवादी ने मुझसे साफ कहा - ‘यह सब सी.आई.ए. का षडयंत्र है। सातवें बेड़े से बादल दिल्ली भेजे जाते हैं।’ स्वतंत्र पार्टी के नेता ने कहा - ‘रूस का पिछलग्गू बनने का और क्या नतीजा होगा? प्रसोपा भाई ने अनमने ढंग से कहा - ‘सवाल पेचीदा है। नेशनल कौंसिल की अगली बैठक में इसका फैसला होगा। तब बताऊँगा।’ राजाजी से मैं मिल न सका। मिलता, तो वह इसके सिवा क्या कहते कि इस राज में तारे निकलते हैं, यही गनीमत है।’ मैं इंतजार करूँगा, जब भी सूर्य निकले। स्वतंत्रता-दिवस भी तो भरी बरसात में होता है। अंग्रेज बहुत चालाक हैं। भरी बरसात में स्वतंत्र करके चले गए। उस कपटी प्रेमी की तरह भागे, जो प्रेमिका का छाता भी ले जाए। वह बेचारी भीगती बस-स्टैंड जाती है, तो उसे प्रेमी की नहीं, छाता-चोर की याद सताती है। स्वतंत्रता-दिवस भीगता है और गणतंत्र-दिवस ठिठुरता है। मैं ओवरकोट में हाथ डाले परेड देखता हूँ। प्रधानमंत्री किसी विदेशी मेहमान के साथ खुली गाड़ी में निकलती हैं। रेडियो टिप्पणीकार कहता है - ‘घोर करतल-ध्वनि हो रही है।’ मैं देख रहा हूँ, नहीं हो रही है। हम सब तो कोट में हाथ डाले बैठे हैं। बाहर निकालने का जी नहीं हो रहा है। हाथ अकड़ जाएँगे। लेकिन हम नहीं बजा रहे हैं, फिर भी तालियाँ बज रहीं हैं। मैदान में जमीन पर बैठे वे लोग बजा रहे हैं, जिनके पास हाथ गरमाने के लिए कोट नहीं है। लगता है, गणतंत्र ठिठुरते हुए हाथों की तालियों पर टिका है। गणतंत्र को उन्हीं हाथों की ताली मिलतीं हैं, जिनके मालिक के पास हाथ छिपाने के लिए गर्म कपड़ा नहीं है। पर कुछ लोग कहते हैं - ‘गरीबी मिटनी चाहिए।’ तभी दूसरे कहते हैं - ‘ऐसा कहने वाले प्रजातंत्र के लिए खतरा पैदा कर रहे हैं।’ गणतंत्र-समारोह में हर राज्य की झाँकी निकलती है। ये अपने राज्य का सही प्रतिनिधित्व नहीं करतीं। ‘सत्यमेव जयते’ हमारा मोटो है मगर झाँकियाँ झूठ बोलती हैं। इनमें विकास-कार्य, जनजीवन इतिहास आदि रहते हैं। असल में हर राज्य को उस विशिष्ट बात को यहाँ प्रदर्शित करना चाहिए जिसके कारण पिछले साल वह राज्य मशहूर हुआ। गुजरात की झाँकी में इस साल दंगे का दृश्य होना चाहिए, जलता हुआ घर और आग में झोंके जाते बच्चे। पिछले साल मैंने उम्मीद की थी कि आंध्र की झाँकी में हरिजन जलते हुए दिखाए जाएँगे। मगर ऐसा नहीं दिखा। यह कितना बड़ा झूठ है कि कोई राज्य दंगे के कारण अंतरराष्ट्रीय ख्याति पाए, लेकिन झाँकी सजाए लघु उद्योगों की। दंगे से अच्छा गृह-उद्योग तो इस देश में दूसरा है नहीं। मेरे मध्यप्रदेश ने दो साल पहले सत्य के नजदीक पहुँचने की कोशिश की थी। झाँकी में अकाल-राहत कार्य बतलाए गए थे। पर सत्य अधूरा रह गया था। मध्यप्रदेश उस साल राहत कार्यों के कारण नहीं, राहत-कार्यों में घपले के कारण मशहूर हुआ था। मेरा सुझाव माना जाता तो मैं झाँकी में झूठे मास्टर रोल भरते दिखाता, चुकारा करनेवाले का अँगूठा हजारों मूर्खों के नाम के आगे लगवाता। नेता, अफसर, ठेकेदारों के बीच लेन-देन का दृश्य दिखाता। उस झाँकी में वह बात नहीं आई। पिछले साल स्कूलों के ‘टाट-पट्टी कांड’ से हमारा राज्य मशहूर हुआ। मैं पिछले साल की झाँकी में यह दृश्य दिखाता - ‘मंत्री, अफसर वगैरह खड़े हैं और टाट-पट्टी खा रहे हैं। जो हाल झाँकियों का, वही घोषणाओं का। हर साल घोषणा की जाती है कि समाजवाद आ रहा है। पर अभी तक नहीं आया। कहाँ अटक गया? लगभग सभी दल समाजवाद लाने का दावा कर रहे हैं, लेकिन वह नहीं आ रहा। मैं एक सपना देखता हूँ। समाजवाद आ गया है और वह बस्ती के बाहर टीले पर खड़ा है। बस्ती के लोग आरती सजाकर उसका स्वागत करने को तैयार खड़े हैं। पर टीले को घेरे खड़े हैं कई समाजवादी। उनमें से हरेक लोगों से कहकर आया है कि समाजवाद को हाथ पकड़कर मैं ही लाऊँगा। समाजवाद टीले से चिल्लाता है - ‘मुझे बस्ती में ले चलो।’ मगर टीले को घेरे समाजवादी कहते हैं - ‘पहले यह तय होगा कि कौन तेरा हाथ पकड़कर ले जाएगा।’ समाजवाद की घेराबंदी है। संसोपा-प्रसोपावाले जनतांत्रिक समाजवादी हैं, पीपुल्स डेमोक्रेसी और नेशनल डेमोक्रेसीवाले समाजवादी हैं। क्रांतिकारी समाजवादी हैं। हरेक समाजवाद का हाथ पकड़कर उसे बस्ती में ले जाकर लोगों से कहना चाहता है - ‘लो, मैं समाजवाद ले आया।’ समाजवाद परेशान है। उधर जनता भी परेशान है। समाजवाद आने को तैयार खड़ा है, मगर समाजवादियों में आपस में धौल-धप्पा हो रहा है। समाजवाद एक तरफ उतरना चाहता है कि उस पर पत्थर पड़ने लगते हैं। ‘खबरदार, उधर से मत जाना!’ एक समाजवादी उसका एक हाथ पकड़ता है, तो दूसरा हाथ पकड़कर खींचता है। तब बाकी समाजवादी छीना-झपटी करके हाथ छुड़ा देते हैं। लहू-लुहान समाजवाद टीले पर खड़ा है। इस देश में जो जिसके लिए प्रतिबद्ध है, वही उसे नष्ट कर रहा है। लेखकीय स्वतंत्रता के लिए प्रतिबद्ध लोग ही लेखक की स्वतंत्रता छीन रहे हैं। सहकारिता के लिए प्रतिबद्ध इस आंदोलन के लोग ही सहकारिता को नष्ट कर रहे हैं। सहकारिता तो एक स्पिरिट है। सब मिलकर सहकारितापूर्वक खाने लगते हैं और आंदोलन को नष्ट कर देते हैं। समाजवाद को समाजवादी ही रोके हुए हैं। यों प्रधानमंत्री ने घोषणा कर दी है कि अब समाजवाद आ ही रहा है। मैं एक कल्पना कर रहा हूँ। दिल्ली में फरमान जारी हो जाएगा - ‘समाजवाद सारे देश के दौरे पर निकल रहा है। उसे सब जगह पहुँचाया जाए। उसके स्वागत और सुरक्षा का पूरा बंदोबस्त किया जाए। एक सचिव दूसरे सचिव से कहेगा - ‘लो, ये एक और वी.आई.पी. आ रहे हैं। अब इनका इंतजाम करो। नाक में दम है।’ कलेक्टरों को हुक्म चला जाएगा। कलेक्टर एस.डी.ओ. को लिखेगा, एस.डी.ओ. तहसीलदार को। पुलिस-दफ्तरों में फरमान पहुँचेंगे, समाजवाद की सुरक्षा की तैयारी करो। दफ्तरों में बड़े बाबू छोटे बाबू से कहेंगे - ‘काहे हो तिवारी बाबू, एक कोई समाजवाद वाला कागज आया था न! जरा निकालो!’ तिवारी बाबू कागज निकालकर देंगे। बड़े बाबू फिर से कहेंगे - ‘अरे वह समाजवाद तो परसों ही निकल गया। कोई लेने नहीं गया स्टेशन। तिवारी बाबू, तुम कागज दबाकर रख लेते हो। बड़ी खराब आदत है तुम्हारी।’ तमाम अफसर लोग चीफ-सेक्रेटरी से कहेंगे - ‘सर, समाजवाद बाद में नहीं आ सकता? बात यह है कि हम उसकी सुरक्षा का इंतजाम नहीं कर सकेंगे। पूरा फोर्स दंगे से निपटने में लगा है।’ मुख्य सचिव दिल्ली लिख देगा - ‘हम समाजवाद की सुरक्षा का इंतजाम करने में असमर्थ हैं। उसका आना अभी मुल्तवी किया जाए।’ जिस शासन-व्यवस्था में समाजवाद के आगमन के कागज दब जाएँ और जो उसकी सुरक्षा की व्यवस्था न करे, उसके भरोसे समाजवाद लाना है तो ले आओ। मुझे खास ऐतराज भी नहीं है। जनता के द्वारा न आकर अगर समाजवाद दफ्तरों के द्वारा आ गया तो एक ऐतिहासिक घटना हो जाएगी।

Tuesday, 24 January 2017

Mr. Obama, An Extraordinary Family Person

President Barack Obama delivered his farewell speech to the nation in Chicago on 10th of January. Undoubtedly it was so powerful, thoughtful and inspiring. I don’t have much interest in the USA’s political conditions and the recent happenings. But I am so influenced by Mr. Barack Obama that I love to follow him. This made me listen to his farewell speech many times. And the best part about his speech was his love for his family. He shared his views on many other topics like democracy, race, changes and serving people. But my favorite part was when he addressed his wife and daughters.
I have previously written how Mr. Barack Obama even being the president of the USA is an extraordinary family man. And that really makes his family special. I feel it’s necessary to quote what he said about his wife, Michelle, in his speech:
Michelle LaVaughn Robinson of the South Side, for the past 25 years you have not only been my wife and mother of my children, you have been my best friend. You took on a role you didn’t ask for and made it your own with grace and grit and style and good humor. You made the White House a place that belongs to everybody. And a new generation sets its sights higher because it has you as a role model. You’ve made me proud. You’ve made the country proud.
In between a purely legislative speech, only Mr. Obama can elegantly put few pages of his personal life. He was in tears when he paid a touching tribute to his wife for being his best friend and a strong supporter. Being his follower, I have read how they both love and tease each other, just like a normal couple. I found both Mr. Obama and lady Michelle being honest about the ups and downs of their married life. And I can say that they have left us with a love manual of sorts. They are simply the epitome of relationship goals.
Mr. Obama’s emotional speech not only brought tears to his eyes but also made his daughter, Malia, cry. He didn’t forget to mention his daughters in his speech as he values his kids so much. Although his second daughter, Sasha, couldn’t attend her father’s last public speech. Sasha had to stay back in Washington, DC to appear for her exam on Wednesday morning. Like any other ordinary family, their daughter’s exam was the most important things for them. And that’s we common people are going to miss about this family.It’s very evident that politics is just one thing of their lives and they always put their family first. Mr. Obama’s speech made him tender and also made so many fathers sentimental who were listening to him. 
Malia and Sasha, under the strangest of circumstances, you have become two amazing young women, smart and beautiful, but more importantly, kind and thoughtful and full of passion. You wore the burden of years in the spotlight so easily. Of all that I’ve done in my life, I’m most proud to be your dad.
Once addressing his staff, Mr. Obama said that when he would be taking his last breath, he would not be thinking about the politics or power. Rather he would like to think about the moments when he walked his little daughter to the playground and saw sunset there holding her hand. He suggested his staff to play equal roles in parenting kids because at the end of the day family is the only thing that matters. I feel Mr. Obama is really a role model for all the parents out there. His life so far is such an inspiration. I wish him lots of happiness ahead!

Why all educated women are not empowered?

It’s very natural and obvious that my favorite topic of reading these days is Women Empowerment. In lieu of this, I got to read something very inspiring last week and it was from an idol Kiran Bedi. Although after contesting Delhi’s election and losing it, I don’t find people admiring her much. However, I am a big fan of her. With her flawless work and powerful verdicts; she is able to prove herself as a true leader to follow. She is India’s first lady IPS officer and is currently working as LG of Puducherry. While attending the India Today Conclave South, Kiran Bedi spoke on why all educated women aren't empowered.  She has a different take on making women empowered in today’s society. She said, "Women are taught to be secure, whereas men are told to be courageous. Women aren't given the resources, finances, education or mobility to be confident enough to protect themselves”.

I completely second her thoughts. We have seen an improvement in society’s behavior towards educating a girl child. But education alone can’t save them from staring eyes and attacking mob. We have seen that with education, girls are achieving milestones of life and career. They are now able to see this world from a different perspective. However, people back home are not willing to change a wee bit. Like, Kiran Bedi, I also studied in a girl’s college. Mostly girls were sound and good in studies but today where they are, simply show the preference of their families because they are GIRLS. A few of my childhood friends simply got married after completing their post graduation. A subset of friends didn’t get permission to go out for studies. I am also from the same society where people think girls are by default weak and vulnerable. However, my parents took a bold step and sent me to pursue higher studies at a place which is 600 kms away from my hometown. Thanks to them, I am an independent woman today. But the irony is although I am working yet I don’t feel empowered enough to fight molester walking on the streets. Like mine, many other parents are allowing their daughters to go to a far city for higher studies, still, girls living in PGs and hostels don’t feel safe after dark because they know that their education can’t help fighting someone trying to harass them. The working women still try to reach home before it’s too late because they are aware of insecurities outside and little strength they have.
Addressing the same problem, Kiran Bedi is trying to make people realize the importance of courage and confidence. That can only happen when our girls feel safe and secure in going out and stretching their work hours. She said that education should also act as a medium to help people dispel fear and march towards progress. So, physical fitness and self-defense should actually be a part of our education system so that no girl could skip it. There should be absolutely no chance of avoiding it. In the same event, lady Kiran Bedi added, “I am waiting for the time when women are able to make use of their education in a way that makes them audacious and courageous enough to voice their opinions and chase their dreams fearlessly.” When she stated, "It's a nature vs nurture argument. It's not in the nature of women to feel empowered--a sense of empowerment can only be taught to them”, I find it so true.  We parents need to make our daughters dominant and fearless. It might need sending them to judo/ karate classes. But you see it’s needed. We don’t want our daughters to face molestation just because they are defenseless. Education system will change, who knows when?

Friday, 20 January 2017

पति नही जीवनसाथी बने..

एक दिन मैं अपने पतिदेव से कह रही थी कि आज कल ये टीवी के डेली soaps ने पत्नियों को दो तरीको से टाइपकास्ट कर दिया है. पहली मिसाल उन पत्नियों क़ी है जो पूरी तरीके से मासूम और सीधी हैं. वो किसी को जवाब नही दे सकती और ना ही किसी किसी की तीखी बातें सुन सकती हैं. हर बात पर या तो खुद को या फिर किस्मत को जिम्मेदार बना देती हैं. ऐसी पत्नियों के लिए पति अभी भी परमेश्वर है. वो मारे पीटे कुछ भी करे वो उफ़ भी नही करेंगी. जरुरत पड़े तो उसकी दूसरी या तीसरी शादी भी खुद ही करवा देंगी. यू कहे तो पूरी गाय है गाय. वही दूसरी मिसाल ऐसी पत्नियों क़ी है जो पूरी तरह से बही हुई है. उनके अजब गजब शौक है. वो घर में किसी क़ी इज्जत नही करती. और अगर पति क़ी करे भी तो पीठ पीछे कोई ना कोई शाजिश रचती रहती है. वो जेम्स बांड क़ी तरह गुंडे बदमाशो से भी लड़ लेती है और जरुरत पड़े तो उनसे काम भी करवा लेती है. पर इन दोनों टाइप्स के बीच की पत्नियों को किसी सीरियल में क्यों नही दिखाते? जो ना ज्यादा सीधी है और ना ज्यादा तेज. जिसे अपने परिवार क़ी ख़ुशी से मतलब है पर जिसे खुद को भी खुश करना पसंद है.

मुझे ऐसा लगता है कि समय के साथ अच्छी पत्नियों को और अच्छा दिखाने के लिए ये पहले टाइप क़ी पत्नियों को जन्म दिया गया है जो पति के लिए कुछ भी कर सकती है. और इसी के चलते २१वी शदी के पतियो को अभी भी १८वी शदी क़ी पत्नी चाहिए. पर ये अच्छी पत्नी होती कैसी है? उसके चार हाथ होते है क्या या फिर दो दिमाग? उसके पास आंसुओ का सैलाब नही होता क्या जो हर लड़की के पास होता ही है? या फिर वो पूरी तरह से दिल दिमाग से बस हँसने और मुस्कुराते रहने के लिए बचपन से कोई अलग ट्रेनिंग लेती है? हम में ज्यादातर लोग ऐसे ही समाज में बड़े हुए है जहा अच्छी पत्नी वो है तो अपना सब कुछ परिवार के लिए दे दे. अच्छी पत्नी वो है वो पति के तानो को भी हस्ते हुए सहे. वो कभी किसी चीज पर अधिकार ना जताए और ना ही मांग रखे. और सबसे बड़ी बात वो बहस ना करे. अच्छी पत्नी तब और अच्छी हो जाती है जब वो अपनी खुशियो को मन के कोने में कही दबा देती है.

ज़माने के साथ सब कुछ बदल गया है पर पत्नियों के लिए ज्यादा अंतर नही आया है. आज कल के मॉडर्न लड़को को कामकाजी पत्नी तो चाहिए पर घर के कामो में हाथ बटाने से परहेज है उनको. पत्नी का appraisal अच्छा होना चाहिए पर अगर वो अपनी मर्जी से पैसे खर्च करना चाहे तो हिसाब चाहिए उनको. बच्चे उनको भी पसंद है पर उनकी देखरेख करने में भी पतियो को परेशानी है. ज्यादातर घरो में अभी भी ये मॉडर्न लड़के परमेश्वर बनने की आस रखते है. वो पत्नी को समझना जरुरी नही मानते. हाँ पत्नी को जरूर पता होना चाहिए की पति को कब चाय चाहिए होगी और कब खाना. पत्नी को ध्यान रखना चाहिए कि कौन सी बात पति को ख़राब लग जाती है तो वो ना बोले. उसे पति के घरवालो के बारे में भी कोई बात नही बोलनी चाहिए पर पति को अधिकार है कि वो पत्नी के घरवालो को कुछ भी कह दे. अभी भी पति पत्नी के बीच के तनाव का कारन ज्यादातर पत्नियों को ही माना जाता है. और अभी भी यही उम्मीद की जाती है "पत्नियों को ही झुकना चाहिए".

पति पत्नी का रिश्ता दुनिया का सबसे अजीब रिश्ता है. हर शादीशुदा जोड़े के अपने नियम कानून होते है जो ज्यादातर पतियो ने ही बनाए होते है. वैसे तो अगर हिन्दू मान्यताओ की बात करे तो शादी के समय हमें सात वचन सुनाए जाते है जो की असल में टर्म्स एंड कंडीशन होते है जिन्हें मानने पर ही पत्नी पति के साथ अपनी पूरी जिंदगी बिताने के लिए हामी भर्ती है. पर वो याद किसे रहते है. फिर तो वही रोज कि खींच तान, खाना पकाना, रूठना मनना  और यू ही दिन काटते रहते है. सबसे जरुरी चीज जो मुझे लगती है इस रिश्ते के लिए वो है एक दूसरे को समझना और सम्मान देना. तो जब अब सती सावित्रियो का समय नही रहा तो पतियो को भी बदलना चाहिए. खुद सम्मान लेते हुए देना भी शुरू करना चाहिए. उनको भी इस बात का ध्यान देना चाहिए कि पत्नी को क्या पसंद है और क्या नही. अगर अच्छी पत्नी चाहिए तो अच्छे पति भी बनना होगा (जिसकी बात लोग काम ही करते है). पति बनने से ज्यादा जीवन साथी बनने पर जोर देना चाहिए. एक ऐसा मित्र जो पत्नी के मन के कोनो में दबी हुई छोटी से छोटी मंशा भी भाप ले!

Monday, 16 January 2017

बचपन वाली धूप..

आज कल कड़ाके की ठण्ड है एनसीआर में, जो मुझे कम ही पसंद आती है. तो ऑफिस में मैं और मेरी दोस्त सौम्या दोनों लंच के बाद थोड़ी देर धूप लेने बाहर जाते है. खिली खिली धूप और रंग बिरंगे फूल देख कर मन खुश हो जाता है. ऑफिस जिस टावर में है उसकी मेंटेनन्स टीम ने चारो ओर अच्छा बगीचा बनाया है जो बैठने की मनाही होने से साफ सुथरा ही रहता है. बगीचों के साथ में चलने के लिए रास्ता बना है जिस पर हम दोपहर की धूप का मज़ा लेते है.  पिछले दिनों हम दोनों अपने अपने बचपन की धूप को याद कर रहे थे. पर अब धूप में वो मेरे बचपन वाली बात नही दिखती.

सच कहू तो बचपन में इस धूप की कोई कदर ही नही थी मुझे तो. जब बाहर जाने के लिए अम्मा मना कर देती थी कि "बाहर धूप है.." तो बड़ा गुस्सा आता था इस धूप पर. पर ठण्ड की बात अलग थी. ठण्ड में संडे का दिन पूरा बाहर ही गुजरता था मेरा. स्कूल की छुट्टी होती थी. सुबह नहा कर और जंगल बुक देख कर मैं और मेरी छोटी बहन दोनों धूप में बैठ जाते थे. फिर अम्मा मेरी पसंदीदा 'तहरी' बनाती थी मटर डाल कर. उधर ईस्ट UP  में सब्जियों वाले पुलाओ को तहरी बोलते है. मैं उनसे जिद करके अपनी प्लेट भी बाहर धूप में ले आती थी. और जो मज़ा था ना धूप में बैठ कर अम्मा के हाथ की बनी तहरी खाने का वो आज के महंगे रेस्टोरेंट में भी नही आता. फिर मैं अपनी फोल्डिंग के चारो तरफ कपडे फ़ैलाने वाले तारो पर चादरे लगाती थी ताकि तेज धूप सीधी ना लगे. और बस सोने का इंतज़ाम होते ही शॉल के अंदर दुबक जाती थी धूप में नींद लेने के लिए. वैसी नींद अब नही मिलती और ना आती है. फिर जैसे ही धूप कम होती थी और शाम दस्तक देने लगती थी, अम्मा मेरे और मेरी बहन के सर में सरसो का तेल लगाती थी. सर की चम्पी खूब अच्छी लगती थी पर उसके बाद जब अम्मा बाल सुलझाती थी मेरे तो चिढ़ होती थी. लगता था जानभूझ कर तेज से कंघी करती है. क्या दिन थे वो सच में.. दिन में धूप का मज़ा और शाम होते ही रज़ाई में बैठ कर मोमफली खाना !

अब तो धूप में बैठना थेरेपी में आने लगा है. डॉक्टर्स फीस लेकर सलाह देते है धूप में बैठो. लोगो को फ्री की धूप नसीब नही है. उनको sun bath के लिए पैसे देने पड़ते है. बड़े शहरो में आम लोगो के घर किसी कबूरतरखाने से कम नही है. ना खुल कर जगह है और ना हवा धूप का रास्ता. लोग १० २० फ्लोर्स वाली इमारत की किसी मंजिल पर अटके रहते है. छत है नही और घर की बालकनी में इतनी धूप आती नही है. और अगर छत हो भी तो वो कॉमन है वहा सोने के बारे में सोचना भी बेवकूफी होगी. मुझे भी इस धूप की कमी खलती है अपनी जिंदगी में. और ये तब से ज्यादा होने लगी है जबसे पता चला की Vit D की कमी है मुझे. कभी भी कही भी दर्द हो जाता है और डॉक्टर बोलता है कुछ नही है Vit D की कमी है. एक बार तो लगा हार्ट अटैक सा है दर्द पर फिर वही Vit D की कमी थी. शायद बचपन में कदर नही की इस धूप की तभी आज उसके पीछे भाग रही हूं मैं. ऑफिस में धूप वाली लंच टेबल्स के फ्री होने का इंतज़ार करती हूं. खाने के बाद धूप में चहलकदमी करती हूं. फिर वीकेंड्स पर अपने बिल्डिंग की छत पर जाती हूं अपने बेटे को लेकर. जगह वहा भी कम है पर धूप में खेलती हूं अपने बेटे के साथ. ज्यादा तो नही पर कुछ हद तक वो बचपन वाली यादें ताजा हो जाती है. और ये मुई Vit D की कमी से भी तो पीछा छुटाना है. पर अपने बचपन वाली धूप को बड़ा मिस करती हूं!

Tuesday, 10 January 2017

जमाना खराब नही होता..लोग खराब होते है..

घर के बड़े लोग कहते है जमाना बदल गया है.. या कहे कि जमाना खराब हो गया है. बेंगलुरु की एमजी रोड और ब्रिगेड रोड पर नए साल के जश्न के दौरान लड़कियो से छेड़छाड़ और अभद्रता से जुड़ा एक वीडियो सामने आया. देख कर लगा दुनिया रहने लायक रह ही नही गई है लड़कियो के लिए. कोई भी खुलेआम कुछ भी कर रहा है और हम बस वीडियो देख कर बड़ी बड़ी बाते कर रहे है. ये छेड़छाड़ और परेशान करना नया नही है. ना जाने कब से लड़किया ये सहती रही है और घर की बड़ी बूड़िया बस यही समझती रही है कि ऐसा होता है. इसे सहना और चुप रहना ही सही है. पर सवाल अब भी वही है जो पहले था.. कब तक सहना होगा?

कितने ही आन्दोलन हुए और कितने ही कदम सरकार ने उठाए निर्भाया की घटना के बाद पर सब नाकाफ़ी है. लोग जो ऐसे अपराध कर रहे है, औरतो और लड़कियो का उत्पीड़न कर रहे है वो बिना किसी डर के घूम रहे है सड़को पर और हम बस नसीहते ले रहे है नेताओ और खुद बने समाज के हितैसियो से. दुनिया कहा से कहा गई है और हम अभी भी लड़ रहे है की हमे भी पहचान चाहिए. हमे कोई बेजान चीज़ ना समझा जाए. मुझे याद आई मेरी माँ की सीख जो उन्होने मुझे दी थी कि जमाना कभी बदलता नही है वही रहता है बस लोग बदल जाते है. जमाना पहले भी खराब था औरतो के लिए और आज भी है. समय के साथ अंतर बस ये आया है की अब हम बोलने लगे है. १९५० मे भी लड़कियो और औरतो को एसी बदसलूकी से गुजरना होता था और २०१७ मे भी वैसा ही हो रहा है. जमाने को १९५० की औरतो की सहनशीलता से परेशानी थी और २०१७ मे औरतो की बेबाकी से. तब अपने इसी समाज के कुछ लोग पूरी तरह से ढके हुए तनो मे झाँकने की कोशिश करते थे और आज जो हो रहा है वो हमने देखा ही है बेंगलुरु मे.
तो जब जमाना खराब भी रहना है हमारे लिए तो क्यू ना चार्ल्स डार्विन का नियम लगाए हम लोग. डार्विन ने "जीवन-संघर्ष (struggle for existence) " का एक सहायक सिद्धांत दिया था "अस्तित्व के लिये जीवों का परस्पर संघर्ष". जीवों मे लगातार संघर्ष चलता रहता है. इस संघर्ष में बहुसंख्या में जीव मर जाते हैं और केवल कुछ ही जीवित रह पाते हैं. पर ऐसे एक संतुलन बना रहता है. कुछ सालो पहले जब मेरी छोटी बहन ने बताया था कि  उसने उसे घूरने वाले एक मनचले के पास जाकर अकड़ते हुए पूछा कि "क्यू घूर रहे हो?" तो मुझे लगा था कि उसने ग़लत किया. जाने देती,ऐसे तो सड़को पर आवारा फिरते ही रहते है. पर अब लगता है सही किया था उसने. अब समय गया गया है जब हमे संघर्ष से डर हटाना होगा. लड़ना होगा. खुल कर बोलना होगा. तभी जमाने को बता सकते है कि तुम बदलो या ना बदलो हम बदल रहे है.. चुपचाप सहना पुराना हो गया. अब समय है ग़लत को ना सहने का... मुंहतोड़ जवाब देने का..घरो मे अपनो से मिलने वाली नफ़रत को बाहर लाने का... किसी के ग़लत तरीके से देखने और छूने पर उसे सबक सिखाने का.. और अस्तित्व के लिए लड़ने का.. तभी संतुलन मे सकती है तन के चोरो की भूख. जमाना खराब है तो हम भी खराब हो जाते है. छोड़ो dance और music की क्लासस, अब self defense ट्रैनिंग मे जाते है.. जीना है तो करना है "जीवन-संघर्ष".